
इल्मा महज चौदह वर्ष की थी, जब उसके सिर से पिता का साया उठ गया। परिवार के लिए खेती-किसानी ही आय का एकमात्र स्रोत था, ऐसे में इल्मा ने अपनी माँ के साथ खेतों में काम करना शुरू कर दिया। परिस्थितियों चाहे कितनी भी कठिन थी, लेकिन इल्मा की दृढ़-इच्छाशक्ति के सामने वह कुछ भी थी। अपने सपने को साकार रूप देने के लिए वह दिन-रात मेहनत करती। खेतों में माँ के साथ करती और साथ में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई के लिए पैसे जुटाती।

डॉ कलाम को आदर्श मानने वाली इल्मा कहती हैं कि “मेरे सपने ने मुझे कभी सोने नहीं दिया”।मुरादाबाद से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका दाख़िला सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली में हो गया। इल्मा इतनी मेधावी छात्रा थी कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उन्हें विदेशों से स्कॉलरशिप मिलने शुरू हो गए। उन्हें प्रतिष्ठित पेरिस स्कूल ऑफ इंटरनेशनल और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ने का मौका मिला। इतना ही नहीं उन्हें विश्व की बड़ी संस्थाओं में से एक क्लिंटन फाउंडेशन के साथ भी काम करने का मौका मिला। इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद उनके ज़हन में कहीं न कहीं देश सेवा की भावना इस कदर परवान चढ़ गई कि उन्होंने वापस स्वदेश लौटने का फैसला किया। भारत लौटकर उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। कोचिंग और किताबों की अनिवार्यता को नज़रअंदाज करते हुए उन्होंने परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।

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