Jul 13, 2024

aps

15 हज़ार की नौकरी छोड़ अपने आइडिया के साथ बढ़े आगे, 3 महीने में ही हुआ 5.5 लाख का मुनाफ़ा

जिंदगी में सफल होना तो हर कोई चाहता है लेकिन सफलता हासिल करने के लिए जिस प्रकार की मेहनत और संकल्प की जरुरत होती है, वह हर कोई नहीं कर पाता। लक्ष्य की राह में आने वाली बाधाओं से हार मानकर लोग अपनी असफलता को भाग्य का हवाला दे देते हैं। यदि दृढ़-संकल्पित होकर कार्य किया जाए तो इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। यदि आपके सपने बड़े हैं तो आपको जिंदगी में रिस्क भी लेने होंगे। हमारिआज की कहानी के नायक ने इस तथ्य को चरितार्थ कर दिखाया है।

प्राइवेट कम्पनी में 15 हज़ार की नौकरी छोड़ करोड़ों का बिज़नेस एम्पायर खड़ा करने वाले धन प्रकाश शर्मा ने एग्रीकल्चर के क्षेत्र में सफलता का एक नया अध्याय जोड़ा है। उत्तर प्रदेश के शामली से ताल्लुक रखने वाले प्रकाश बैचलर की डिग्री के बाद प्राइवेट सेक्टर में जॉब करने शुरू कर दिए। हालाँकि उनके मन में कहीं-न-कहीं अपना व्यवसाय शुरू करने की इच्छा हमेशा से थी।  

महाराष्ट्र की प्राजक्ता ने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ शुरू किया मधुमक्खी पालन, 7 लाख है सालाना कमाई

महाराष्ट्र की प्राजक्ता ने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ शुरू किया मधुमक्खी पालन, 7 लाख है सालाना कमाई!

प्राजक्ता अदमाने महाराष्ट्र के एक आदिवासी जिले गड़चिरोली से है। फार्मेसी और एमबीए में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, पुणे में वे एक अच्छी नौकरी कर रहीं थी। पर प्राजक्ता इससे संतुष्ट नहीं थी और हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थी।

महाराष्ट्र के एक नक्सली क्षेत्र गड़चिरोली से आने वाली प्राजक्ता को अपने गांव के साथ जुड़े इस दाग के बारे में अच्छे से पता था। लेकिन गड़चिरोली सिर्फ इतना ही नहीं है। और भी बातें हैं जो गड़चिरोली को खास बनाती हैं। जैसे यहाँ का खूबसूरत वन और प्राजक्ता जैसे लोग जो अपने गांव को और भी बेहतर व रचनात्मक कारणों के चलते मशहूर करना चाहते हैं।

उनकी कुछ अलग करने की यह इच्छा उन्हें एक मल्टीनेशनल कंपनी से वापिस उनके ज़िले में ले आयी, एक मधुमक्खी पालक (बी-कीपर) के रूप में।

“यह व्यवसाय शुरू करने से पहले मैंने रिसर्च किया और जाना कि इसके लिए व्यवसायिक प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है। मैंने राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड से प्रशिक्षण लिया। इस तरह से मैं कश्मीर से लेकर आंध्र प्रदेश तक हर जगह के मधुमक्खी पालकों से जुड़ गयी। मैंने उनसे इस व्यवसाय की हर छोटी-बड़ी चीज़ को सीखा।”

आज प्राजक्ता पचास मधुमक्खी-बक्सों से शहद बनाती हैं। इसके अलावा उन्होंने गड़चिरोली के विभिन्न प्रकार के फूलों की प्रजातियों से प्रेरणा लेकर अलग अलग स्वाद वाला शहद बनाना शुरू किया। जिसमें बेरी, नीलगिरी, लिची, सूरजमुखी, तुलसी और शीशम शामिल है।

ये अलग-अलग किस्म का शहद हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। जैसे, बेरी वाला शहद डायबिटीज़ में बहुत फायदेमंद होता है और शीशम का शहद दिल के लिए अच्छा होता है।

नीलगिरी शहद खांसी और ठंड जैसी आम बीमारियों के लिए एक अच्छा इलाज है। इसी तरह, अजवाइन पाचन में मदद करता है।

प्राजक्ता, ‘कस्तूरी शहद’ के नाम से इस शहद को बेचती हैं। शहद की हर बोतल 60 रूपये से लेकर 380 रूपये तक की कीमत से बेचीं जाती है। मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन के अलावा वे मधुमक्खी का विष भी बेचती हैं। दरअसल यह विष बहुत सी बिमारियों, जैसे कि गठिया की दवाईयों में इस्तेमाल होता है।

अपने व्यवसाय से प्राजक्ता हर साल 6-7 लाख रूपये की कमाई करती हैं। हालांकि, पैकेजिंग और वितरण के लिए वे कारोबार में 2-2.5 लाख रुपये का निवेश करती हैं। फिर भी वे हर साल अच्छा लाभ कमा लेती है। वह अपने गांव के बेरोजगार युवाओं और महिलाओं को भी मधुमक्खी पालन सिखा रही है, जिससे उन लोगों को कुछ कमाई करने में मदद मिलती है।

“हम इस व्यवसाय में ज्यादा से ज्यादा महिला सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स, बेरोजगारों और युवाओं को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।”


दमखम के बल पर एक मजबूत व्यक्ति ने, जिसे एक समय कोई नहीं जानता था, न केवल अपने रास्ते के तमाम रुकावटों को लांघा बल्कि आज भारत के शीर्ष उद्योगपति की सूची में भी शुमार कर रहे हैं।

“ड्राइविंग के समय अपने दिमाग से निर्णय लेने की आवश्यकता होती है दिल से नहीं। यदि आप घबरा गए तो आपकी मुलाकात हो जाएगी रोड एक्सीडेंट से ” यह कहना है ज़ेरोधा के फाउंडर और सीईओ का, जिन्होंने ट्रेडिंग मार्केट की तुलना सड़क ड्राइविंग से की है। एक किशोर ने स्टॉक में ट्रेडिंग करना शुरू किया और जब वे बड़े हुए तब स्वयं की अपनी एक सफल कंपनी खोल ली। दमखम के बल पर एक मजबूत व्यक्ति ने, जिसे एक समय कोई नहीं जानता था, न केवल अपने रास्ते के तमाम रुकावटों को लांघा बल्कि आज भारत के शीर्ष उद्योगपति की सूची में भी शुमार हो गए।

नितिन कामथ की कहानी तब से शुरू होती है जब वे 17 साल के थे। अपने पिता के फण्ड का प्रबंध करते हुए उन्होंने अपना समय पेशेवर ट्रेडर के साथ देना शुरू किया था। परन्तु ट्रेडिंग के लिए पैसे नहीं होने के कारण नितिन ने तीन सालों तक एक कॉल सेंटर में नौकरी कर ली।

ज्यादातर भारतीयों युवाओं की तरह ही नितिन ने भी इंजीनियरिंग में दाखिला लिया परन्तु उसके बाद उन्होंने वह रास्ता चुना जो अधिकतर ग्रेजुएट्स नहीं कर पाते हैं — इंटरप्रेन्योरशिप का। उस समय वे एक तरफ कॉलेज में अपने आप को ढाल रहे थे, साथ ही साथ ट्रेडिंग कर रहे थे और रात में कॉल सेंटर में नौकरी भी। तीन साल नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी खुशी-खुशी इसलिए छोड़ दी क्योंकि उनके एक ग्राहक ने उन्हें अपना पैसा मैनेज करने का काम सौंपा।

जल्द ही उन्हें ढेर सारे लोगों ने अप्रोच किया और जब रिलायंस मनी लांच हुआ तब वे एक सफल सब-ब्रोकर बन गए। वे इस सिस्टम को ज्यादा पसंद नहीं कर पा रहे थे और इस नौकरी में उन्हें कुछ कमी लग रही थी। तब जाकर उन्होंने ज़ेरोधा की नींव रखी। उनकी यह यात्रा संघर्षों से भरी थी पर उनका अपने ऊपर भरोसा कभी भी कम नहीं हुआ और वे आगे बढ़ते चले गए।

“एक ट्रेडर की हैसियत से मैंने हमेशा यह महसूस किया कि रिलायंस मनी के वर्किंग में कुछ तो कमी है। एक ट्रेडर को कुछ और अतिरिक्त सुविधाओं की ज़रुरत थी जो वर्तमान ट्रेडिंग प्लेटफार्म में सुलभ नहीं थी, इसलिए मैंने ज़ेरोधा शुरू करने का निश्चय किया।” — नितिन

रोधा के रूप में 2010 में भारत को अपना पहला ऐसा ट्रेडिंग फर्म मिला जो मौजूदा ब्रोकरेज की कीमत को कम करने के लिए प्रतिबद्ध था और प्रति खरीद-बिक्री पर फ्लैट दर से फीस की सुविधा प्रदान करता हो। ज़ेरोधा की कोर टीम में नितिन के भाई निखिल, और रिलायंस मनी के कुछ साथी भी शामिल हो गए। निखिल ने प्रोप-ट्रेडिंग डेस्क, रिस्क मैनेजमेंट और ट्रेडिंग से संबंधित सब कुछ संभाला। उनके साथी वेणु और हनन ने कस्टमर सर्विस संभाला।

साल 2009 को याद करते हुए नितिन कहते हैं कि बाजार भारी उतार-चढ़ाव के दौरान पागल सी हो जाती है और कोई ट्रेंड फॉलो नहीं करती जिसे किसी तर्क से समझा जा सके। उस समय जब बाजार चुनाव के बाद अपर सर्किट पर बंद हुआ था। वह साल हमारे लिए खुद को परिभाषित करने वाला रहा थाl  

नितिन कहते हैं कि ट्रेडिंग समय में बहुत बार केवल पैसे पर ही ध्यान केंद्रित रहता था पर निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता था। जब उन्होंने 2007-2008 में अपनी रणनीति बदल दी और डील पर ज्यादा ध्यान देने लगे तब उन्हें सफलता मिली। अब तो उनके छोटे भाई ने भी उनके बिज़नेस को ज्वाइन कर लिया है क्योंकि ट्रेडिंग उनके जीन में है।

ऑनलाइन ब्रोकरेज कंपनी ज़ेरोधा ने अपने वेब आधारित हिंदी भाषा के ट्रेडिंग पोर्टल “काइट” का आगाज किया है। कंपनी ने सभी इक्विटी निवेश पर जीरो ब्रोकरेज का भी एलान किया है, साथ ही इसमें कोई अपफ्रंट फीस, कोई न्यूनतम वॉल्यूम, कोई विशेष नियम और शर्त स्ट्रिंग भी शामिल नहीं होंगे। निवेश की आसान संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कंपनी ने अपना म्युचुअल फण्ड बिज़नेस शुरू करने की भी घोषणा की है।

“मेरे चाचा हमेशा कहते थे कि लक्ष्मी माता कमल में बैठी रहती हैं और कमल तैरता रहता है। तुम उसका पीछा नहीं कर सकते। तुम्हें उसे अपने पास आने तक का इंतजार करना चाहिए।”

एक सफल बिज़नेसमैन बनने के लिए आपको हमेशा अच्छा होमवर्क करना होगा, स्मार्ट इन्वेस्टमेंट करने की काबिलियत और धैर्य की तो बेहद आवश्यकता है। और नितिन के सफलता की यही सबसे बड़ी वजह है। ज़ेरोधा के आज 2,50,000 यूज़र्स हैं और इसमें 600 कर्मचारी काम करते हैं।

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चार्टर्ड अकाउंटेंसी छोड़ अपने आइडिया के साथ बढ़े आगे, चंद महीने में हुई 50 लाख की कमाई..

यह कहानी दिल्ली के एक ऐसे युवा की है जिसने सबसे अलग कुछ नया करने की कोशिश की। आपको यकीं नहीं होगा इस शख्स की एक मामूली सी सोच ने इन्हें आज करोड़ों रुपये की कंपनी का मालिक बना दिया। इनका आइडिया इतना दमदार था कि चार सालों के भीतर इनकी कंपनी ने दो लाख महीने की आमदनी से 50 लाख महीने की आमदनी तक का सफ़र तय कर लिया।

जी हाँ नई दिल्ली के रॉबिन झा ने सचमुच अपनी कंपनी के ज़रिये एक प्याली चाय में तूफान सा समा कर रख दिया है। इनके कंपनी की चौंकाने वाली सफ़लता के पीछे उनका चाय और नाश्ते का कारोबार है।

आप सोच रहे होंगे की यह सड़क के किनारे कोई चाय के ठेले चलाने वाले की बात हो रही है पर आप गलत सोच रहे हैं; क्योंकि यह कोई मामूली से चाय के व्यापारी नहीं हैं। रॉबिन झा टी-पॉट के सीईओ हैं, जिनकी स्टार्ट-अप श्रृंखला पूरे दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में फैली हुई है।

पेशे से एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और विलय व अधिग्रहण  कंपनी  ‘एर्न्स्ट एंड यंग’ के साथ काम करने वाले रॉबिन ने कभी नहीं सोचा था कि वह इस तरह का अनोखा और बढ़ने वाला काम करेंगे।

रॉबिन ने साल 2013 में अपने नौकरी से बचाये पूंजी के 20 लाख रुपये से इसकी शुरुआत करी। उन्होंने अपने दोस्त अतीत कुमार और असद खान, जो खुद भी चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, के साथ मिलकर दिल्ली के मालवीय नगर में एक चाय आउटलेट खोली। और कुछ ही दिनों में अप्रैल 2012 में अपने बिज़नेस को बड़ा करने के उद्येश से इन्होंने शिवंत एग्रो फूड्स नाम की एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना की।

अपने दोस्तों के साथ विचार मंथन के बाद अपने व्यापार के लिए उन्होंने चाय के साथ ही आगे बढ़ने का फैसला किया। इनके पिता नरेंद्र झा जो बैंक मैनेजर हैं और माँ रंजना दोनों ही इनके इस बिज़नेस के खिलाफ थे और इसकी सफलता के प्रति आशंकित भी थे, लेकिन रॉबिन की दृढ-इच्छाशक्ति के आगे उन्हें भी झुकना पड़ा।

अपने आइडिया के साथ आगे बढ़ते हुए इन्होंने बहुत सारे कैफ़े मार्केट के बारे में जानकारी हासिल की और उनकी मांग और आपूर्ति के बारे में भी खोजबीन की शुरू कर दी। इससे यह पता चला कि 85-90 फीसदी भारतीय केवल चाय ही पीते हैं और यही उनके बिज़नेस का आधार बना। टीपॉट एक ऐसा चाय का प्याला है जिसके साथ बहुत तरीके के नाश्ते शामिल हैं।

अपने अनुभव का इस्तेमाल कर रॉबिन ने चाय बागानों और दिल्ली के विभिन्न कैफ़े में चाय के विशेषज्ञों को ढूंढा। और आखिर में टी पॉट का जन्म मालवीय नगर के मेन मार्किट में स्थित एक 800 स्क्वायर फ़ीट के शॉप में हुआ। शुरुआत में केवल 10 लोग काम करने वाले थे और 25 तरह की चाय और कुछ जलपान के विकल्प रखे गए।

रॉबिन अपने आगे के प्लान को सुधारने के लिए उपभोक्ताओं के विचार टेबलेट और पेपर के जरिये लिया करते थे। यह काम इन्होंने मालवीय नगर के अपने आउटलेट में पहले के तीन महीनों में किया। निष्कर्षों से पता चला कि उनके यहाँ जो ग्राहक आते हैं वह 25 से 35 साल की आयु वाले ज्यादा होते हैं और ऑफिस में काम करने वाले। यह सब समझ में आने पर रॉबिन ने ऑफिस के आसपास ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। इसी क्रम में उन्होंने अपना पहला ऑफिस आउटलेट 2014 में आईबीबो में खोला जो कि गुरुग्राम की एक बड़ी ऑनलाइन ट्रेवल कंपनी है।

आज टीपॉट के 21 आउटलेट हैं जिसमे आधे तो दिल्ली एनसीआर के ऑफिस एरिया में हैं जैसे वर्ल्ड ट्रेड टावर, नोएडा और के.जी.मार्ग में और बाकी  मार्किट, मेट्रो स्टेशन, इन्द्रा गाँधी इंटरनेशनल एयर पोर्ट में स्थित है। आज रॉबिन के टीपॉट में लगभग 6 दर्जन वर्गीकृत चाय की 100 से अधिक सारणी की सेवा दी जाती है। जैसे -ब्लैक टी, ओलोंग, ग्रीन, वाइट, हर्बल और फ्लेवर्ड।

इतना ही नहीं टीपॉट ने आसाम और दार्जीलिंग के पांच चाय के बागानों से टाई -अप भी किया है। टीपॉट आज देश की एक अग्रणी चाय-नाश्ता की कंपनी है जिसमे थाई, इटालियन और कॉन्टिनेंटल नाश्ते परोसे जाते हैं। इसके साथ-साथ कुकीज़, मफिन्स, सँडविचेस, वडा-पाव, कीमा पाव, रैप्स आदि सर्व किये जाते हैं।

अपनी सफलता का राज बताते हुए रॉबिन कहते हैं हम अपने ग्राहकों को समझते हैं, अपनी गुणवत्ता पर हमेशा पूरा ध्यान रखते हैं और हमारा लॉन्ग टर्म विज़न है

रॉबिन अपने टीपॉट की आईडिया के साथ साल 2020 तक 10 बड़े शहरों में लगभग 200 आउटलेट खोलने के लिए तैयार हैं।

रॉबिन के सफ़लता का सफ़र यह प्रेरणा देती है कि कोई भी आइडिया छोटा या बड़ा नहीं होता। बस हमें पूरी दृढ़ता के साथ अपने आइडिया पर काम करने की जरुरत है।

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घर बैठे व्हाट्सएप पर साड़ियाँ बेचकर हर महीने 1.5 लाख रूपये कमा रही हैं चेन्नई की शंमुगा..!

   

घर बैठे व्हाट्सएप पर साड़ियाँ बेचकर हर महीने 1.5 लाख रूपये कमा रही हैं चेन्नई की शंमुगा..!

आज वही शंमुगा ‘यूनीक थ्रेड्स’ के नाम से साड़ियों का बिज़नेस चला रही हैं, जिसमें वे व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया के माध्यम से विक्रेता और ग्राहकों से संपर्क बना कर रखती हैं। इनका नेटवर्क करीब 16 ग्रुप द्वारा फैला हुआ है, जिसमे 250 छोटे विक्रेता, जिनसे एक खुद माल खरीदती हैं और 86,000, ऐसे विक्रेता जुड़े हुए हैं जो इनकी साड़ियाँ आगे ग्राहकों को बेचते हैं।
इस बिज़नेस से ये हर महीने 1.5 लाख रूपये तक कमा लेती हैं और त्यौहारों के समय इस आय में और भी बढ़ोतरी हो जाती है!
पर शंमुगा के लिए यह सब बिल्कुल भी आसान नहीं था!
10 साल तक एचआर के पद पर नौकरी करने वाली शंमुगा को अपनी सास की बिगड़ती तबीयत के चलते नौकरी छोड़नी पड़ी। पर उनके नौकरी छोड़ने के कुछ अरसे बाद ही उनकी सास का निधन हो गया था।
शंमुगा का रिश्ता अपनी सास के साथ बहुत गहरा था। उनके लिए वे उनकी सगी माँ से भी बढ़कर थीं। इसलिए अपनी सास की मौत का उन्हें बहुत सदमा लगा।



शंमुगा प्रिया की सास (साभार: शंमुगा)

उनकी ज़िन्दगी जैसे रुक-सी गयी थी, पर घर के हालात कुछ ऐसे हो गये थे कि उन्हें अपनी नौकरी छोड़ कर उन सभी जिम्मेदारियों को संभालना था, जो अब तक इनकी सास संभाल रही थी। उस समय उनका बेटा तीन महीने का था और उनके पति, हरी दिल्ली में जॉब से संबंधित किसी ट्रेनिंग में व्यस्त थे।
कॉलेज से ग्रेजुएट होते ही उन्होंने नौकरी करना शुरू कर दिया था। इसलिए अब इस तरह घर में खाली बैठना उन्हें खल रहा था और इससे उनका दुःख सिर्फ़ बढ़ रहा था।
द बेटर इंडिया को वे बताती हैं, “इस दौरान मेरे पति ने मुझे बताया कि किस तरह उनकी माँ ने घर-घर घूम कर साड़ी बेचीं और उन्हें व उनके भाई-बहनों को अकेले पाला। अपने हिस्से के संघर्षो का सामना करने के बाद भी उन्होंने ध्यान रखा कि उनके बच्चों पर कोई आंच न आये। उनकी कहानी ने मुझे इतना प्रेरित किया कि मैंने भी एक कोशिश करने की ठानी।”
साल 2013 में; 30,000 रुपये की मामूली लागत के साथ शंमुगा प्रिया ने इस व्यवसाय की शुरुआत की और साड़ियाँ खरीदने के लिए स्थानीय बाज़ार के चक्कर काटने लगीं।




शंमुगा प्रिया

वे याद करती हैं, “मैंने घर पर साड़ियाँ लगायी, और पड़ोसियों को बता दिया। उन पड़ोसियों ने अपने दोस्तों और जान-पहचान वालों तक यह बात पहुंचाई। लोगो का आना-जाना जारी रहा, पर मैं देखती कि लोग घंटों तक साड़ियाँ देखते और दिन भर घर में आते-जाते रहते थे, और सिर्फ़ एक साड़ी खरीदते। यह बहुत तनावपूर्ण हो गया था और मैं अक्सर सोचती कि कहीं मैंने गलत निर्णय तो नहीं ले लिया।”
उम्मीद की किरण तब जागी, जब उन्होंने अपनी कॉलेज की एक दोस्त को कुछ साड़ियों की फोटो खींचकर भेजी, जिसने खुद आगे बढ़ कर व्हाट्सएप पर अपने एलुमनी ग्रुप में तस्वीरें भेज दीं।
शंमुगा प्रिया गर्व से बताती हैं, “एक सप्ताह के भीतर, मेरे घर पर रखा पूरा माल बुक हो गया था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैंने अपना पहला पैकेज कूरियर किया था। व्यापार करने का यह तरीका बहुत नया था, पर मेरे लिए यह ‘क्लिक’ कर गया और फिर मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।”
फिर उन्होंने घर बुला कर कपड़े दिखाने का सिलसिला बंद कर दिया और साड़ियों की बिक्री केवल व्हाट्सएप द्वारा करने लगी। उनसे कई ऐसे ग्राहकों ने भी संपर्क किया जो उनकी साड़ियों को आगे बेचना चाहते थे। इस प्रस्ताव को शंमुगा ने ख़ुशी- ख़ुशी स्वीकार कर लिया।
वे बताती हैं, “इनमें से अधिकतर गृहणी, कॉलेज के विद्यार्थी या कई छोटे स्तर के व्यापारी थे, जो मेरी साड़ियों को बेच कर कुछ अच्छा कमाना चाहते थे। मेरे हित में जो बात काम कर रही थी, वह थी मेरे कपड़ों की विशिष्टता, जिसे मैं खुद चुनती और स्टाइल करती थी।”
कई ग्राहकों से बात करने के बाद उन्होंने ‘यूनिक थ्रेड्स’ को एक व्यापक मंच देने का फैसला किया और फिर 8 मार्च 2013 को यह फेसबुक पर भी आ गया।



साभार: शंमुगा प्रिया

इस कदम से उनकी बिक्री काफ़ी बढ़ गयी और उन्होंने फेसबुक पर ही ‘री सेलर’ ग्रुप भी बनाया, जिसमे आज 86,000 सदस्य हैं!
वे बताती हैं कि इन ग्रुप्स में लोग किसी विशेष स्टाइल के लिए आग्रह करते हैं या फिर आपस में संपर्क करते हैं। हर एक तरीके से उनका नेटवर्क बढ़ता है। उन्हें ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और नीदरलैंड से भी आर्डर मिले हैं।
जहाँ पहले शंमुगा प्रिया स्थानीय दुकानों से साड़ियाँ खरीदती थी, अब उन्हें सीधा उत्पादकों से लेने की ज़रूरत महसूस होने लगी।
उन्होंने आगे बताया, “इससे मुझे यात्रा करने और उत्पादकों से मिलने का मौका मिला। इसके साथ ही मैंने अलग-अलग तरह के कपड़ों के बारे में और साड़ी बिक्री के व्यवसाय के बारे में बहुत कुछ जाना। मैं तह-ए–दिल से मानती हूँ कि थोक विक्रेताओं ने मुझे बहुत सहयोग दिया क्योंकि आम तौर पर वे आगे से इतने सहायक नहीं होते और इससे नए उद्यमियों के लिए मुश्किल होती है। पर मेरे मामले में इनके मार्गदर्शन ने अहम् भूमिका निभायी है।”
इनकी कहानी इतनी प्रसिद्ध हुई कि व्हाट्सएप ने इस पर एक शोर्ट फिल्म भी बनायी है, आप यहाँ देख सकते हैं।



व्हाट्सएप के प्रेसिडेंट से मुलाक़ात

ऑनलाइन मार्किट के चलते बिज़नेस में पिछल कुछ सालों में तेज़ी आई है, पर साथ ही प्रतिद्विन्दी भी बहुत हैं। शंमुगा प्रिया मानती है कि उनकी यूएसपी उनके कपड़ों का सबसे अलग होना है, जो कई बार ‘ट्रेंडसेटर’ बन जाते हैं।
वे बताती हैं, “ उदाहरण के लिए, आज कलमकारी की मांग दुनिया भर में है। पर जब हमने शुरुआत की थी, तब ऐसा नहीं था। मैं मानती हूँ कि हमारे प्रोडक्ट्स और साथ ही लोगों द्वारा इनकी सराहना, इस सबने हमारे हित में काम किया है।”
वर्तमान में, शंमुगा प्रिया के पास 6 लोगों का स्टाफ है और वे कोवुर में इनके घर के फर्स्ट फ्लोर से काम करते हैं। सारी साड़ियाँ और अन्य सामान यहाँ इकठ्ठा होते हैं और यहीं से पैक कर के भेजे जाते हैं। आमतौर पर ये प्रतिदिन कम से कम 80 साड़ियाँ बेचती हैं और त्योहारों में यह गिनती दुगनी हो जाती है।
कई लोगो ने उन्हें सलाह दी है कि शंमुगा प्रिया को व्हाट्सएप से आगे बढ़ना चाहिए और बेहतर बिज़नेस के लिए व्यापक रूप से इसे बढ़ाना चाहिए। पर वे कहती हैं कि बिज़नेस के नज़रिए के साथ उन्होंने शुरुआत की ही नहीं थी।



शंमुगा के घर में ही स्टोर

अंत में वे बताती है, “मुझे लगता है कि सब कुछ एकदम सामने होना ही ज़रूरी नहीं है। बिज़नेस को इस तरह से भी चलाया जा सकता है, जैसा कि यूनीक थ्रेड्स ने पांच सालों में साबित किया है।”
शंमुगा प्रिया का दृढ़ विश्वास, कड़ी मेहनत और अपने काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने ही उनके बिज़नेस को ऊँचाईयों तक पहुँचाया है। by aps

सीख / घमंड की वजह से हमारी सारी अच्छाइयों का प्रभाव खत्म हो जाता है, इसीलिए इस बुराई से बचें

राजा को संत को दान में देना चाहता था अपना राजमहल, लेकिन संत ने कहा कि ये तो प्रजा का है, यहां आप प्रजा की भलाई के लिए काम करते हैंपुराने समय में एक राजा अपनी प्रजा के सुख का पूरा ध्यान रखता था। वह बहुत ही धार्मिक और संस्कारी था। जब उसका जन्मदिन आया तो उसने सोचा कि आज मुझे किसी एक व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूरी करनी चाहिए। पूरे राज्य की प्रजा अपने प्रिय राजा को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए राजमहल पहुंची। प्रजा के साथ ही एक संत भी बधाई देने आए थे। राजा साधु-संतों का बहुत सम्मान करता था। वह संत से मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने संत से कहा कि गुरुदेव आज मैंने प्रण किया है कि मैं किसी एक व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी करूंगा। मैं आपकी सभी इच्छाएं पूरी करना चाहता हूं। आप मुझसे जो चाहें मांग सकते हैं।संत ने कहा कि मैंने तो सांसारिक जीवन त्याग दिया है, मैं राज्य से बाहर रहता हूं, दिनभर भगवान की भक्ति में लगा रहता हूं, मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है। अगर आप कुछ देना ही चाहते हैं तो खुद की इच्छा से मुझे कुछ भी दे सकते हैं।ये सुनकर राजा सोचने लगा कि संत को क्या देना चाहिए, उसने कहा कि मैं आपको एक गांव दे देता हूं। संत ने कहा कि नहीं महाराज, गांव तो वहां रहने वाली प्रजा का है। आप तो सिर्फ उस गांव के रक्षक हैं। राजा ने कहा आप ये महल ले लीजिए। संत बोलें कि ये भी आपके राज्य का ही है। यहां बैठकर आप प्रजा की भलाई के लिए काम करते हैं। ये भी प्रजा की संपत्ति है। बहुत सोचने के बाद कहा कि आप मुझे अपना सेवक बना लें। मैं खुद को सपर्पित करता हूं। संत ने कहा कि नहीं महाराज, आप पर तो आपकी पत्नी और बच्चों का अधिकार है। मैं आपको अपनी सेवा में नहीं रख सकता हूं।संत के तर्क सुनकर राजा परेशान हो गया, उसने कहा कि गुरुदेव अब आप ही बताएं, मैं आपको क्या दूं? संत ने कहा कि राजन् आप मुझे अपना अहंकार दे दीजिए। आज अपने अहंकार का त्याग करें, ये एक बुराई है, इसे इंसान आसानी से छोड़ नहीं पाता है। अहंकार की वजह से व्यक्ति के जीवन में कई परेशानियां आती हैं। राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया कि वह किसी भी व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी कर सकता है। उसने अहंकार छोड़ने का संकल्प ले लिया।by aps 

उस महिला की कहानी, जिनकी गाँधीवादी विचारधारा ने 10 लाख बच्चों को बाल मजदूरी से बचाया....

आज एक कॉल में, मैंने एक बहुत ही शांत और दयालु महिला को सुना, यद्यपि वह अपने तरीके से काफी प्रखर और मुखर भी हैं, खासकर तब जब बात  सामाजिक न्याय और बाल अधिकारों की आती है। वह एक प्रोफेसर हैं, एक सक्रिय कार्यकर्ता और मममीदिपुड़ी वेंकटारागैया फाउंडेशन (एमवीएफ) के संस्थापक हैं। वह अथक रुप से हमारे देश के बच्चों की उन्नति के लिए काम कर रही है। पीछले 30 साल से भी अधिक से वह बाल श्रम खत्म करने और बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं।

पद्म श्री पुरस्कार विजेता शांता सिन्हा ने अपनी जिंदगी की यात्रा के बारे में बताया और कैसे वह बाल उत्पीड़न और बंधन के खिलाफ की जंग जीत रही है।

7 जनवरी 1950 को आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में जन्मी शांता सात भाइयों के बीच एकमात्र लड़की थीं। उनके ऊँच्च जाति के ब्राह्मण परिवार ने अपने बच्चों के पालन पोषण में विशेष सुविधाओं के साथ नहीं हो यह सुनिश्चित कर रख था। अपने जीवन के पहले 20 साल उन्होंने हैदराबाद में बिताए, जहां उन्हें उस्मानिया विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर की डिग्री ली। बाद में, वे आंध्र प्रदेश के नक्सली आंदोलन में पीएचडी प्राप्त करने के लिए जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जे.एन.यू.), नई दिल्ली गईं।

1972 में जे.एन.यू में अध्ययन करते हुए, उन्होंने अपने सहपाठी से शादी की। “मेरी पहली बेटी, मेरी पीएचडी खत्म करने से पहले हुई थी। उसे मुझे अपने माता-पिता के साथ छोड़ना पड़ा ताकि दिल्ली में मैं जल्द अपनी पढ़ाई पूरी करने का प्रयास कर सकूँ” , उन्होंने बताया। एक माँ के लिए यह बहुत कठिन विकल्प है, लेकिन शांता को पता था कि उन्हें अपनी शिक्षा पर ध्यान देना होगा क्योंकि यह भी उनका जुनून था।

वापस आने के बाद, शांता एक व्याख्याता के रूप में उस्मानिया विश्वविद्यालय में नियुक्त हुई और उन्हें फिर दूसरी बेटी प्राप्त हुई। 1979 की शुरुआत में उनकी नियुक्ति हैदराबाद विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में हुई। जीवन में अब पहले से काफी शांत और स्थिरता थी। वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, अब वह अपने परिवार के साथ थी और अपने श्रम के फल का आनंद ले सकती थी। लेकिन एक झटके ने सब रोक दिया था जब मस्तिष्क रक्तस्राव के कारण उन्होंने अपने पति को खो दिया।

“चूंकि मेरे दो बच्चीयाँ थी, इसलिए मैं काम कर रही थी और मेरे माता-पिता ने हमारी देखभाल की। 1984 में, मुझे विश्वविद्यालय से भारत की ग्रामीण राजनीति पर एक कोर्स करना था। इस विषय के बारे में बात करने से पहले मैंने एक गांव में जाने का सोचा” ,उन्होंने कहा। शांता हैदराबाद विश्वविद्यालय के आसपास के गांवों में जाना शुरु की। वह इसे अपनी विश्वविद्यालय परियोजना का एक हिस्सा बनाना चाहती थीं, साथ ही केंद्र सरकार द्वारा चलने वाले श्रमिक विद्यापीठ नामक एक कार्यक्रम के लिए भी आवेदन किया।

“यह एक श्रमिक शिक्षा कार्यक्रम था और देश में पहली बार ग्रामीण श्रमिकों की शिक्षा के लिए कार्यक्रम था।”

“हर शाम मैं आंखें बंद कर गांवों में आना शुरू कर दिया, बिना यह जाने कि मैं क्या कर रही थी। वहां मैं दलित परिवारों और बंधुआ मजदूरों के परिवार मिली। हर रात मैं वहीं रहती और अगले दिन विश्वविद्यालय जाती थी” , उन्होंने तह खोला। उनके माता-पिता ने उन्हें प्रोत्साहित किया क्योंकि उन्होंने लगता था कि वह अपना रास्ता ढूंढ रही है। इस प्रक्रिया में, शांता को बॉन्डेड लेबर सिस्टम (एबालिशन) एक्ट मिला और उन्होंने समझा कि उन लोगों को बंधन से मुक्त कराना पड़ेगा।

“मेरा एक दोस्त था जो एक निकटतम जिले में ही इस मुद्दे पर काम कर रही थी। मैंने उसके कार्यक्रमों को देखा, उसकी मदद मांगी और बंधन से बाहर निकलने के लिए उन लोगो को जुटाना शुरू कर दिया। मैं पढ़ाती थी और धीरे-धीरे संगठन तैयार करने लगी और उन्हें अपने अधिकारों पर जोर देने के लिए मजबूत करने लगी” ,वह कही।

श्रमिक विद्यापाठ के माध्यम से शांता ने उन्हें व्यवस्थित करना शुरू कर दिया और सरकार से अनुबंध जारी करने के लिए अपील करना शुरु कर दिया। यह गणना करने के लिए कि उन्हें वास्तव में कितना वेतन मिलेगा, किसानों के मुआवजा मिलने के लिए, महिलाओं के लिए न्यूनतम मजदूरी के प्रबंध के लिए, वह उन्हें श्रम अदालत में ले जा रही थी। “मैं धीरे-धीरे एक संघ के रुप में काम कर रही थी बिना उसे यूनियन का नाम दिए। जब मैं श्रमिक विद्यापाठ के नाम पर पढ़ाने और इस काम को जारी रख रही थी, तभी श्रमिक विद्यापाठ में मेरा कार्यकाल खत्म हो गया।”

शांता ने देखा कि बंधुआ लोगों के 40 प्रतिशत बच्चे थे और उनकी कोई आवाज नहीं थी। वह दुर्व्यवहार और हेरफेर की व्यवस्था को समाप्त करना चाहती थी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और गुलाम श्रम से मुक्त होने के साथ इन बच्चों का भविष्य देना चाहती थी।

ऐसे में तब, जब शांता ने अपना परिवारिक ट्रस्ट मममीदिपुड़ी वेंकटारागैया फाउंडेशन (एमवीएफ) शुरू किया जो गरीब बच्चों के उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति के साथ उनके कल्याण के लिए काम कर रहा था। वह बच्चों और बंधुआ श्रमिकों के बच्चों पर ध्यान देने के साथ जुड़ गई। “उन क्षेत्रों में, बहुत टकराव और तनाव था अगर आप बच्चों के लिए काम कर रहे हैं, तो आपको बहुत अधिक सावधान रहना होगा क्योंकि उन्हें इतना तनाव नहीं किया जा सकता है” , शांता ने कहा।

उन्होंने उन कार्यों की नई रूपरेखा पर काम करना शुरू कर दिया जहां बच्चों पर कोई जोखिम नहीं रखा गया था। उन्होंने पूरी तरह से कामकाज की शैली बदल दी और बच्चों के सहयोग के लिए गांव में सभी को रज़ामंद कर काम करने का फैसला किया। और इसे किसी जाति या वर्ग के मुद्दे पर नहीं बल्कि इसे बच्चों के मुद्दे पर बनाया। “हमने उन्हें यह भी समझाया है कि यदि कोई बच्चा स्कूल से बाहर है तो वह बच्चा एक बाल मजदूर है।”

बच्चों के बचाव के बाद भी, उन्होंने पाया कि बच्चों के पास कहीं जाने के लिए कोई जगह नहीं था, जैसा कि उन्हें पहली कक्षा में भर्ती कराया गया था मगर वे उस कक्षा में रहने के लिए बहुत बड़े थे। आवासीय कार्यक्रमों की शुरूआत से उन्हें अपनी उम्र के लिए उपयुक्त एक कक्षा के लिए तैयार किया जाने लगा इसे ब्रिद कोर्स क्लास कहते हैं। 20 साल की अवधि में एमवीएफ के इस शिविर के माध्यम से कम से कम 60,000 छात्र मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल हुए हैं। शिक्षक ऐसे थे जो इन बच्चों के बारे में असंवेदनशील थे लेकिन आज, एमवीएफ के साथ करीब 3,000 स्कूली शिक्षक काम करते हैं।

14 नवंबर को एमवीएफ ने उन सभी नियोक्ताओं को एकत्रित किया जो बच्चों को रोजगार देते थे और विद्या दान समारोह आयोजित किया। जहां नियोक्ताओं ने उन बच्चों को जो बंधुआ मजदूरों के रूप में कार्यरत थे उन्हें पेंसिल और स्कूल बैग दिया और बदले में बच्चों ने उन्हें छोड़ने के लिए उन सब को हार पहनाए।

2017 तक, एमवीएफ के करीब 86,000 स्वयंसेवक हैं। 1 मिलियन से अधिक बच्चे बंधित श्रम से मुक्त हो गए हैं और उन्हें स्कूल में नामांकित किया गया है। इसके अलावा, 168 गांव अब बाल श्रम मुक्त हैं।

शांता का कहना है कि प्रत्येक बच्चे को स्कूल में लाना संघर्ष का एक हिस्सा था, लेकिन उन्होंने गांव के ध्रुवीकरण के बिना संघर्ष को हल करना सीखा। “जब हमने काम से 10 लाख लोगों को वापस ले लिया, हमने 10 लाख प्रतिद्वंदों का समाधान किया, क्योंकि सभी कुछ संघर्ष से होता है। इसके बाद जब कोई संघर्ष हुआ है तो बातचीत, चर्चा और सहमति हुई है कि बच्चों को स्कूल जाना है” ,उन्होंने और बताया।

अपने वर्षों के समर्पण और कड़ी मेहनत के लिए, 1998 में शांता को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 2003 में उन्हें शिक्षा अंतर्राष्ट्रीय की ओर से अल्बर्ट शंकर अंतर्राष्ट्रीेेेय पुरस्कार और उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला। उनके प्रभाव के कारण, भारतीय संसद ने दिसंबर 2005 में बाल अधिकार अधिनियम पारित किया, जिसमें बाल अधिकार संरक्षण (एनसीपीसीआर) के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाया गया। प्रोफेसर सिन्हा को आयोग की पहली अध्यक्ष की भूमिका निभाने के लिए चुना गया था और तीन-तीन साल के लिए दो लगातार पदों के लिए काम किया।

फोन बंद किए जाने से पहले, शांता एक बहुत मजबूत संदेश देती है वह कहती हैं, “सभी को यह समझना चाहिए कि बच्चे भी वयस्कों से कम नहीं हैं। दरअसल, वे अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे अधिक कमजोर हैं। अगर हम एक वयस्क का किसी अन्य वयस्क को मारना बर्दाश्त नहीं करते हैं, तो हम किसी वयस्क का किसी बच्चे मारना या दंडित करना क्यों बर्दाश्त करें?” उन्होंने और कहा, “बच्चों को सम्मान दें जो लोग घरेलू कामगार के रुप में बच्चों को रोजगार दे रहे हैं वे किसी भी रुप से उनका भला नहीं कर रहे हैं। यह बच्चा है जो आप पर एहसान कर रहे है। “

“आपका जीवन बच्चों के जीवन पर निर्भर है आपकी रोटी, कपडा, मकान पूरी तरह बाल श्रम पर निर्भर हैं। कम से कम जागरुकता बरतें कि वे अपने खून और हड्डियों से सायबान बना करके अपके खून और हड्डियों का निर्माण करते हैं। उनका जीवन और आपके जीवन परस्पर निर्भर हैं, ” उन्होंने यहाँ समाप्त किया।

प्रोफेसर शांता सिन्हा ने अपने गांधीवादी दृष्टिकोण से कई सारे जीवन बचाए हैं। सामाजिक सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में उनका काम अविश्वसनीय है। हम उसके प्रयासों को सलाम करते हैं।

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Jul 12, 2024

13,000 रुपये से 5400 करोड़ का टर्नओवर, पढ़ें एक मामूली दूधवाले की प्रेरणादायक कहानी

जैसा की हम सबको पता है कि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है और हमारी आबादी के एक बड़े हिस्से का मुख्य पेशा कृषि आधारित ही है। लेकिन इस सच्चाई के बावजूद हमारी नई पीढ़ी का रुझान कृषि के प्रति दिनों-दिन कम होता जा रहा है। हर साल भारी तादात में युवाओं का पलायन रोजगार की तलाश में गांव से शहर की ओर होता है। खेती और मवेशीपालन जैसे सफल अवसरों को छोड़ शहर की उबाऊ जिंदगी को गले लगाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। शहर में जहाँ एक ओर इन युवा शक्ति का शोषण किया जाता है तो वहीं कई लोगों को तो महीनों नौकरी की तलाश में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है।

आज हम एक ऐसे इंसान की कहानी लेकर आए हैं जिनकी सफलता जानकर आप दांतों तले अंगुली दबा लेंगें। इतना ही नहीं यह कहानी खासकर उन लोगों के लिए भी है जो समझते हैं कि कृषि क्षेत्र में संभावनाओं की कमी है। 5400 करोड़ का टर्नओवर करने वाली देश की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की डेयरी कंपनी बनाने वाले इस व्यक्ति की कहानी बेहद प्रेरणादायक है।

हटसन एग्रो की आधारशिला रखने वाले आरजी चन्द्रमोगन आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। तमिलनाडु के थिरुथंगल में एक बेहद ही गरीब नादर परिवार में जन्में चन्द्रमोगन ने काफी कम समय में ही पढ़ाई से नाता तोड़ लिया। घर की दयनीय आर्थिक हालातों को देखते हुए इन्होंने कामकाज ढूंढने शुरू कर दिए। कई सालों तक यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा। समय के साथ आर्थिक स्थिति सही होने की बजाय गिरती ही चली गई। अंत में इनका परिवार 13,000 रुपए में अपनी सारी संपत्ति बेच साल 1970 में आरजी चंद्रमोगन एंड कंपनी शुरू की।

कंपनी की शुरुआत एक कृषि फर्म के रूप में हुई थी। शुरुआत में इन्होंने मवेशी पालन का धंधा शुरू किया था। महज चंद गाय से शुरू हुई यह फर्म साल दर साल बड़ी होती चली गई। चन्द्रमोगन इन गायों से दूध निकाल उसे डेयरी तक पहुँचाया करते थे। यह सिलसिला 16 वर्षों तक चला। धीरे-धीरे इनके पास मवेशियों की संख्या बढ़ गई और ज्यादा मात्रा में दुग्ध उत्पादन होने लगे। फिर इन्होंने खुद की एक डेयरी फर्म खोलने का फैसला लेते हुए साल 1986 में, आरजी चंद्रमोगन एंड कंपनी को ‘हटसन एग्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ के रूप में स्थापित किया।

उन्होंने सबसे पहले अपने राज्य में ताज़ी और स्वच्छ दूध की सप्लाई शुरू की। अरोक्या और गोमाथा नाम से दूध के दो ब्रांडों को बाजार में पेश करते हुए उन्होंने कुछ ही वर्षों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और गोवा में अपनी पैठ जमा ली। 2003 तक 6.25 लाख लीटर दूध की बिक्री रोजाना होनी शुरू हो गई और जिसमें चेन्नई में सिर्फ 1.55 लाख लीटर की बिक्री रिकॉर्ड की गई। ग्राहकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कंपनी कर्नाईपुरम, सलेम और मदुरै में कारोबार का विस्तार करते हुए अपनी डेयरी यूनिट बनाई।

हटसन एग्रो ने कुछ महीने पहले चेन्नई में अपना एक हजारवाँ रिटेल आउटलेट शुरू किया है। हटसन एग्रो द्वारा जारी अधिकारिक बयान में कहा गया है कि कंपनी की योजना अगले एक साल में रिटेल आउटलेटस की संख्या तीन गुना करने की है।

कंपनी ने पिछले तीन सालों में अपना कुल कारोबार तीन गुना बढ़ा दिया है और यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती डेयरी कंपनी बन गई है। पिछले 3 लगातार तिमाहियों में 116 फीसदी की रिकार्ड वृद्धि दर्ज करते हुए आज यह देश की अग्रणी कृषि फर्म में से एक है। प्रतिदिन 1 मिलियन लीटर दूध बेचते हुए चंद्रमोगन ने आइसक्रीम सेक्टर में भी कदम रखा।

आज अरुण आइसक्रीम दक्षिण भारत में एक लोकप्रिय आइसक्रीम ब्रांड है। आज इनके 1000 से अधिक एक्सक्लूसिव आइस क्रीम पार्लर भी हैं। मई 2008 में उन्होंने सेशेल्स में प्रति दिन 3000 लीटर की क्षमता वाला आइसक्रीम संयंत्र स्थापित किया और फिर फिजी में एक और संयंत्र। इतना ही नहीं यह कंपनी शेयर बाज़ार में भी सूचीबद्ध है।

आज आरजी चन्द्रमोगन को देश की पहली पीढ़ी के सबसे सफल उद्यमी के रूप में देखा जाता है। 13,000 रुपये से शुरुआत कर देश की एक विशाल उद्यम की स्थापना करने वाले इस व्यक्ति से हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है।

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aps

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