May 30, 2020

हम भले ही इन्हें नहीं जानते, किन्तु इनके द्वारा स्थापित ब्रांड आज हर भारतीयों के लिए एक जाना-पहचाना नाम है।..

धैर्य और दृढ़ संकल्प का बेमिसाल उदाहरण पेश करती दिल को छू लेने वाली यह कहानी एक शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति की है, जिसने शून्य से एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया। एक छोटे से फोटोकॉपी की दुकान से शुरुआत कर भारत के खुदरा व्यापार में क्रांति लाने वाले इस शख्स को जिंदगी की राह में अनगिनत बाधाओं का सामना करना पड़ा। व्यापार में कई करोड़ों की हानि के बावजूद उन्होंने हार न मानते हुए एक बार फिर से नए साम्राज्य का निर्माण कर कारोबारी जगत में सब को आश्चर्यचकित कर दिया।
गरीबी से त्रस्त परिवार में पैदा लिए राम चन्द्र अग्रवाल बचपन में ही पोलियो का शिकार हो गए और अपने चलने की क्षमता को खो दिया। बैसाखी के सहारे चलते हुए उन्होंने जीवन का हर-एक दिन बड़ी मुश्किल से गुजारा। किसी तरह ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1986 में उन्होंने पैसे कर्ज लेकर एक फोटोकॉपी की दुकान खोली।
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एक साल तक दुकान चलाने के बाद राम चन्द्र ने कोई खुदरा करोबार शुरू करने की सोची। इसी कड़ी में उन्होंने कोलकाता के लाल बाज़ार में एक कपड़ा बेचने का दुकान खोला। कई सालों तक दुकान चलाने के बाद उन्हें ऐसे कारोबार में एक बड़ा अवसर दिखा। करीबन 15 सालों तक दुकान चलाने के बाद उन्होंने इसे बंद कर बड़े स्तर पर एक खुदरा व्यापार शुरू करने की योजना बनाई।
साल 2001 में राम चन्द्र अग्रवाल ने कोलकाता छोड़ दिल्ली शिफ्ट होने का फैसला लिया। और दिल्ली पहुँच कर उन्होंने “विशाल रिटेल” के नाम से एक खुदरा व्यापार की शुरुआत की। एक छोटे से आउटलेट से शुरुआत होकर ‘विशाल’ दिनोंदिन विशाल होता चला गया। 2002 में दिल्ली में ‘विशाल मेगामार्ट’ के रूप में पहली हाइपरमार्केट आरम्भ करते हुए कंपनी आसपास के क्षेत्रों में अपनी पैठ जमानी शुरू कर दी।
धीरे-धीरे कारोबार फैलता हुआ कई शहरों तक पहुँच गया और साल 2007 में कंपनी नें 2000 करोड़ का प्रारंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव (आईपीओ) निकाला। राम चंद्र अग्रवाल दिनों-दिन सफलता के नए पायदान पर चढ़ रहे थे। साल 2007 में शेयर बाजार में तेजी के दौरान विशाल रिटेल की लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए उन्होंने भारी मात्रा में बैंक से उधार लेकर आउटलेट्स में सुविधाएं स्थापित पर जोर दिया।
दुर्भाग्य से, साल 2008 में शेयर बाजारों में आई भयंकर गिरावट की वजह से विशाल रिटेल को 750 करोड़ का नुकसान हुआ और कंपनी दिवालिया हो गई। लेनदारों का उधार चुकाने के लिए राम चन्द्र अग्रवाल को विशाल रिटेल को बेचने की नौबत आ गई। काफी जद्दोजहद के बाद साल 2011 में विशाल रिटेल का सौदा श्रीराम ग्रुप के हाथों तय हुआ।
आप समझ सकते हैं कि ऐसी विषम परिस्थिति में कोई भी सामान्य मनुष्य एक तरह से अपाहिज हो जायेगा और पहले से ही अपाहिज व्यक्ति पर क्या असर हुआ होगा? लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि राम चंद्र अग्रवाल हार नहीं मानते हुए V2 रिटेल के नाम से एक बार फिर खुदरा व्यापार को पुनः आरंभ किया।
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V2 रिटेल लिमिटेड भारत में सबसे तेजी से बढ़ते खुदरा कंपनी में से एक है। परिधान और गैर-परिधान उत्पादों के एक विशाल रेंज को पेश करते हुए यह कंपनी आज देश के 32 शहरों में अपना आउटलेट्स खोल चुकी है। किफायती दामों पर नवीनतम फैशन उत्पाद उपलब्ध कराते हुए यह आज देश की एक अग्रणी खुदरा व्यापार वाली कंपनी बन चुकी है।
राम चंद्र अग्रवाल की उपलब्धियां हमारे लिए बेहद प्रेरणादायक हैं। अपने शारीरिक चुनौती के बावजूद एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार शून्य से एक विशाल साम्राज्य बनाने वाले राम चंद्र अग्रवाल की जिंदगी हमें काफी कुछ सिखाती है।
  by aps

With An Innovative Idea, This Woman Created A Multi-Crore Firm From Rs 15,000.

Nature has given us ample resources to use for our benefit and some of those precious gems are hidden as materials we often consider total waste. It takes special talent to recognize and utilize even the discarded, waste material and turn them into gold and entrepreneurs Mahima Mehra and Vijendra Shekhawat have done just that.

Starting with a loan of Rs 15,000, they chose elephant dung as their raw material and built a business whose turnover now runs into crores of rupees. Yes, you read it right. The beginning goes back to 2003 when the duo went to Jaipur where they stumbled upon hordes of fibrous dung near Jaipur’s Amber Fort. For decades people overlooked it considering total waste but they saw immense potential in it and decided to make paper out of it.

Taking one look at the products from their brand Haathi Chaap will change the way you look at dung. They make everything from notebooks, photo albums, frames, bags, gift tags, stationery to tea coasters with their price ranging from Rs 10 to Rs 500.

Unlike many businesses who first establish themselves in India and then begin exporting, Mahima started exporting their paper to Germany and did it for four years before launching her products in the Indian market. Their products have also found a market in United Kingdom. The cleaning of the dung is one of the most important processes. The dung is washed thoroughly with water in large water tanks. The water of the dung is used as fertilizers in the field, and the dung is dried up and used to manufacture paper.

Shekhawat says, “My mother went ballistic at the idea of bringing dung into the house. She claimed no one would ever marry me because of my occupation.”

Mahima preferred an eco-friendly way of living ever since she was little. This attitude helped her identify elephant dung as a useful resource. Haathi Chaap has a small team of villagers who help them with processing the dung and making paper out of it. Elephants apparently have a bad digestive system, which makes their dung highly fibrous, resulting in good quality paper.

Their products have an edge of having too much novelty which cannot be ignored and can market itself. Their initiative is green, chemical-free and gives us brilliant products.

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Story Submitted By aps.....

आप यकीन नहीं करेंगे उन्होंने करोड़ों का साम्राज्य स्थापित करते हुए पूरे गांव के लोगों के लिए तरक्की का रास्ता खोल दिया।....

आज हमारे देश में बेरोजगारी एक जटिल समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है। रोजगार की तलाश में प्रतिदिन सैकड़ों युवा शहरों की ओर कूच कर रहे हैं। इतना ही नहीं शहर में यह युवा वर्ग दो जून की रोटी के लिए मजदूरी तक करने को मजबूर है। वहीं कुछ लोग गांव की मिट्टी में ही सफलता का इतना शानदार बीज बोया कि गांव छोड़ शहर की ओर पलायन करने का विचार करने वाले युवाओं को एक बार फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है। कौड़ियों से करोड़पति बनने वाले कई किसानों की कहानियाँ हमने अबतक पढ़ी लेकिन आज की कहानी सबसे भिन्न है। यह कहानी एक ऐसे किसान की है जिन्होंने गन्ने के पेड़ से ही एक बिज़नेस आइडिया निकाला। और फिर गांव में ही अपने कारोबार की नींव रखी। करोड़ों का साम्राज्य स्थापित करते हुए पूरे गांव के लोगों के लिए तरक्की का रास्ता खोल दिया।

राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर बस्ती से 55 किलो मीटर दूरी पर बसा गांव केसवापुर कई दशकों से बुनियादी जरूरतों के अभाव में जूझ रहा था। यहां के लोग रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की तरफ पलायन कर रहे थे। तभी सभापति शुक्ला नाम के एक किसान की सोच ने पूरे गांव के लोगों के लिए तरक्की का रास्ता खोल दिया।

साल 2001 में पारिवारिक कलह की वजह से सभापति शुक्ला घर से अलग होने का निश्चय किया। पुस्तैनी जमीन में एक छोटी सी झोपड़ी डाल नए सिरे से अपनी जिंदगी की शुरुआत की। रोजी-रोटी के लिए शहर की ओर पलायन करने की बजाय शुक्ला ने ग्रामीण बैंक से लोन लेकर एक गन्ने का क्रशर लगाया। 2003 तक तो उनका व्यवसाय ठीक से चला लेकिन उसके बाद उन्हें दोगुनी हानि होने लगी। हताशा के इन्हीं दिनों में एक रात उन्होंने अपनी पत्नी को गन्ने की बोझ में आग लगाने के लिए कहा। उस घटना को याद करते हुए सभापति शुक्ला बताते हैं कि पत्नी ने मुझसे कहा गन्ना को जलाने की बजाय उसके रस से सिरका बनाकर लोगों में बांट देना उचित होगा। घर में बनें सिरके का स्वाद लोगों को इतना पसंद आया कि सब दोबारा डिमांड करने लगे। तभी उन्हें इसमें एक बड़ी कारोबारी संभावना दिखी और उन्होंने अपनी ढृढ़ इच्छा शक्ति से व्यापक पैमाने पर सिरका बनाने का फैसला किया।

सभापति ने बिज़नेस की शुरुआत अपने एक पुराने क्लाइंट के पास एक लीटर सिरका बेचकर किया। उसके बाद उन्होंने आस-पास के छोटे दुकानों तक अपने कारोबार का विस्तार किया। धीरे-धीरे जिन दुकानों में सिरका गया वहां से उसकी डिमांड बढ़ती गई। बस फिर क्या था, वह जब इस व्यवसाय से जुड़े तो उन्हों ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वह लाखों लीटर सिरके का निर्माण कर उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पंजाब, बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश समेत अन्य राज्य में सप्लाई करते हैं और इससे उन्हें करोड़ों रुपये का वार्षिक टर्न ओवर हो रहा है।

शुक्ला बताते हैं कि 200 लीटर सिरका निर्माण में करीबन दो हजार रुपये की लागत आती है और बिक्री से 2 हजार रुपये प्रति ड्रम की बचत होती है।

सिरके की अच्छी बिक्री के बाद हमने आचार आदि भी बनाने शुरू कर दिए। सभापति शुक्ला ने अपने इस कारोबार में गांव के सभी बेरोजगार लोगों को रोजगार दिया है और दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करने वाले ग्रामवासी आज फक्र से सिर ऊंचा कर जीवन जी रहे हैं। इतना ही नहीं आज राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर उनके दस हजार स्क्वायर फिट की जमीन में फैक्ट्री चलती है। फैक्ट्री के पीछे के एक टुकड़े में वे खेती भी करते हैं। आधा दर्जन दुधारू पशुओं की एक छोटी सी डेयरी भी है। अब उनकी योजना हाईवे पर एक रेस्टोरेंट खोलने की है।

सभापति शुक्ला की सफलता पर गौर करें तो हमें यह सीखने को मिलता है कि हमारे आस-पास ही वो तमाम संभावनाएं मौजूद है जो हमारी किस्मत बदलने की ताकत रखती है। बुलंद हौसला और संभावनाओं को परखने की काबिलियत हो तो इस दुनिया में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

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जब एक किसान की बेटी बिना किसी कोचिंग के देश के सबसे कठिन परीक्षा को फतह करती है तो जाहिर तौर पर यह सिर्फ उनके परिवार के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है।..


चौदह साल की उम्र में जिंदगी उस पायदान पर रहती है, जहाँ आप अपने भविष्य को लेकर सुनहरे सपने देखते हो। और तभी अगर जिंदगी में कोई बड़ा हादसा हो जाए तो फिर सारे सपनों पर पानी फिर जाता है। ऑल इंडिया सिविल सर्विसेज में 217वीं रैंक हासिल करने वाली इल्मा अफ़रोज़ की जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही हुआ, लेकिन उनकी मजबूत इच्छाशक्ति के आगे परिस्थितियों को घुटने टेकने पड़े। और वह देश की करोड़ों बेटियों के लिए मिसाल बन गईं।
इल्मा महज चौदह वर्ष की थी, जब उसके सिर से पिता का साया उठ गया। परिवार के लिए खेती-किसानी ही आय का एकमात्र स्रोत था, ऐसे में इल्मा ने अपनी माँ के साथ खेतों में काम करना शुरू कर दिया। परिस्थितियों चाहे कितनी भी कठिन थी, लेकिन इल्मा की दृढ़-इच्छाशक्ति के सामने वह कुछ भी थी। अपने सपने को साकार रूप देने के लिए वह दिन-रात मेहनत करती। खेतों में माँ के साथ करती और साथ में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई के लिए पैसे जुटाती।




डॉ कलाम को आदर्श मानने वाली इल्मा कहती हैं कि “मेरे सपने ने मुझे कभी सोने नहीं दिया”।
मुरादाबाद से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका दाख़िला सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली में हो गया। इल्मा इतनी मेधावी छात्रा थी कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उन्हें विदेशों से स्कॉलरशिप मिलने शुरू हो गए। उन्हें प्रतिष्ठित पेरिस स्कूल ऑफ इंटरनेशनल और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ने का मौका मिला। इतना ही नहीं उन्हें विश्व की बड़ी संस्थाओं में से एक क्लिंटन फाउंडेशन के साथ भी काम करने का मौका मिला। इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद उनके ज़हन में कहीं न कहीं देश सेवा की भावना इस कदर परवान चढ़ गई कि उन्होंने वापस स्वदेश लौटने का फैसला किया। भारत लौटकर उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। कोचिंग और किताबों की अनिवार्यता को नज़रअंदाज करते हुए उन्होंने परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
वो कहते हैं ना मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती, इल्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनकी मेहनत रंग लाई और अपने पहले प्रयास में ही उन्होंने 217वीं रैंक हासिल कर सफलता का परचम लहरा दिया। एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली इल्मा बतौर आईपीएस अपनी जिम्मेदारी को भली-भांति समझती हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को न्याय दिलाना हमेशा मेरी प्राथमिकता में शामिल रहेगा।




जब एक किसान की बेटी बिना किसी कोचिंग के देश के सबसे कठिन परीक्षा को फतह करती है तो जाहिर तौर पर यह सिर्फ उनके परिवार के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है। इल्मा जैसी देश की बेटियों पर हमें फख्र है, जो सच में हिन्दुस्तान को महाशक्ति बनाने की काबिलियत रखते हैं।
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किराने की दुकान से हुई एक मामूली शुरुआत, आज है 100 करोड़ का टर्नओवर.....


यह कहानी ऐसे ही एक शख्स की सफलता को लेकर है। उन्होंने अपने बचपन की शुरुआत कोलकत्ता में एक छोटे से किराने की दुकान पर अपने पिता के साथ काम करते हुए व्यतीत किया और आज भारत के सबसे बड़े क्षेत्रीय खाद्य ब्रांड के कर्ता-धर्ता हैं। ऐसा कर इस शख्स ने सिद्ध कर दिया कि जो लोग बड़ा सोचते हैं और उसे साकार करना जानते हैं उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है।
यह कहानी भारतीय फ़ूड ब्रांड प्रिया फ़ूड प्रोडक्ट्स लिमिटेड की आधारशिला रखने वाले कारोबारी गणेश प्रसाद अग्रवाल की है। सिर्फ तीन दशकों में ही अग्रवाल कंपनी विकसित होकर पूर्वी भारत के सबसे बड़े ब्रांड के रूप में उभरा है। आज इनका सालाना टर्न-ओवर 100 करोड़ रूपयों का है। बर्तमान में कंपनी के नौ प्लांट्स हैं और 100 टन का इनका रोज़ का उत्पादन है। इनके द्वारा बनाये 36 प्रकार के बिसकिट्स और पंद्रह तरीके के स्नैक्स आइटम पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा के बाज़ारों में उपलब्ध है।





कोलकाता से बीस किलोमीटर दूर एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्में गणेश के पिता किराने की दुकान चलाते थे। घर की माली हालात ठीक नहीं रहने पर भी उनके पिता हमेशा शिक्षा के महत्त्व पर जोर देते थे।
अग्रवाल अपने पिता के साथ दुकान में बैठते थे और कुछ प्राइवेट ट्यूशन्स करते थे, पर उनके पिता उन्हें अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने को कहते थे। अपना स्नातक नार्थ कोलकत्ता के सिटी कॉलेज से पूरा करने के बाद वे अपने पिता की दुकान में मदद करने लगे क्योंकि सात लोगो के परिवार को चलाने के लिए इसकी सख्त जरुरत थी। लगभग 14 सालों तक इन्होंने यह काम जारी रखा।
आखिर में कुछ अलग करने की उनकी सोच ने उन्हें आज इस मक़ाम पर खड़ा कर दिया। किराने की दुकान पर काम करने से उन्हें यह बात तो समझ में आ गई कि खाने के सामान में कभी भी मंदी नहीं आती। सितंबर 1986 में इन्होंने एक बिस्कुट बनाने की फैक्ट्री शुरू करने का निश्चय किया। पूंजी जुटाना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी लेकिन इन्होंने अपने हिस्से की प्रॉपर्टी को गिरवी रखकर और दोस्तों से कुछ उधार लेकर पूंजी जुटाई। अपने दोस्तों से और बैंक से उन्होंने कुल 25 लाख रुपये जुटाए और अपने बिज़नेस की आधारशिला रखी।
बिस्कुट के उद्योग में जरुरी उपकरण,ओवन और बहुत सारे काम करने वाले चाहिए होते है अग्रवाल हमेशा बड़ा सोचते थे, इसलिए इन्होंने दो एकड़ जमीन अपने घर पानीहाटी के पास ली और 50 बिस्कुट बनाने वाले कारीगर नौकरी पर रखे। और इस तरह भारत के मशहूर बिस्कुट ब्रांड प्रिया का जन्म हुआ।
अग्रवाल अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताते हैं “अधिक से अधिक काम मैं स्वयं ही करता था। और दिन भर ऑफिस से फैक्ट्री घूमता रहता था। कभी-कभी मेरा काम सात बजे सुबह से लेकर रात के एक बजे तक चलता था। वह समय मेरे लिए बहुत ही कठिन था।”
बिस्कुट का बिज़नेस आसान नहीं था क्योंकि बाजार में पहले से ही पारले-जी और ब्रिटानिया का दबदबा था। उन्होंने यह महसूस किया कि अगर मार्केटिंग बहुत अच्छी होगी तभी लोगों के मन में इस ब्रांड के लिए सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।





गणेश ने बिना वक़्त गवायें तुरंत ही पांच लोगों की टीम बनाई जो घर-घर जाकर प्रिया के प्रोडक्ट के बारे में लोगों को जानकारी देने शुरू कर दिए। इन्होंने पहले ग्लुकोस और नारियल के बिस्कुट बनाए। बहुत ही कम दाम में अच्छी क्वालिटी के बिस्कुट मुहैया करना इनके बिज़नेस की रणनीति थी और यह सफल भी हुई। इसके बाद अग्रवाल ने दूसरे क्षेत्रों में भी हाथ आजमाए।
2005 में उन्होंने रिलायबल नाम का एक प्लांट शुरू किया जिसमें आलू के चिप्स और स्नैक्स तैयार किये जाते थे। 2012 में उन्होंने सोया नगेट्स का प्लांट डाला। आज उनके दोनों बेटे इनकी कंपनी के डायरेक्टर है।
गणेश प्रसाद अग्रवाल जिन्होंने अपनी ऊँची सोच और कड़ी मेहनत के बल पर आज इस मक़ाम पर पहुंचे। उनके सफलता की यह यात्रा युवा उद्यमीयों के लिए बेहद प्रेरणादायक है।
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May 28, 2020

माता-पिता के साथ खेतों में काम करने वाले अली कैसे बन गए मणिपुर के पहले IAS ऑफिसर.....

सच ही कहा गया है कि अगर व्यक्ति के भीतर मंज़िल तक पहुँचने की चाहत और दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो दुनिया की कोई भी ताकत उसे अपने सपने को पूरा करने से नहीं रोक सकती। हमारी आज की कहानी भी एक ऐसे ही शख्स की सफलता को लेकर है, जिन्होंने तमाम चुनौतियों का मुकाबला कर इस कथन को चरितार्थ कर दिखाया है। मणिपुर के एक छोटे से समुदाय से निकल कर आईएएस ऑफिसर बनने तक का सफ़र तय करने वाले अस्कर अली की कहानी प्रेरणा से भरी है।

2016 बैच के आईएएस अधिकारी सस्कर एक ऐसे मणिपुरी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जो सदियों से हासिये पर खड़ी है। मीतेई-पंगल नामक यह समुदाय राज्य की आबादी का केवल आठ प्रतिशत है और शायद ही कभी किसी वजहों से मीडिया या लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा हो। वर्षों से अवहेलना का शिकार हुए इस समुदाय को पहचान दिलाने के उद्देश्य से सस्कर अली ने भरपूर मेहनत की और आज सिर्फ अपने समुदाय के सामने ही नहीं बल्कि लाखों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। 

हुमंस ऑफ़ एलबीएसएनएए नामक एक फेसबुक पेज के साथ अपनी कहानी साझा करते हुए सस्कर ने लिखा है कि जब मैं कक्षा 9 में था, तभी मेरे भीतर आईएएस बनने का सपना पैदा हुआ। स्कूल के दौरान, मैं अपने माता-पिता के साथ खेतों में काम करता था। यहीं से मेरे भीतर कठिन मेहनत करने की भावना पैदा हुई। आईएएस के पद तक पहुँचने में कई बार ऐसे मौके आए जब लोगों ने मेरे सपनों पर संदेह किया लेकिन मेरी कठिन मेहनत और जुनून ही था जिसने मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

मैं जिस समुदाय से आता हूँ वहां शिक्षा के माध्यम से प्रगति कभी प्राथमिकता नहीं रही है। शायद ही कोई होगा जिसने आईएएस बनने के सपने भी देखे होंगे।

दिल्ली विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक करने के बाद उन्होंने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू की। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भी उन्होंने अपनी तैयारी को जारी रखा और साल 2015 में सफलता हासिल करने वाले अपने राज्य से पहले शख्स बने।

अपने आईएएस बनने की सफलता को वह एक बड़ी कामयाबी मानते हैं न सिर्फ अपने लिए बल्कि पुरे समुदाय के लिए। उनका मानना है कि यह भले ही एक छोटी सफलता है लेकिन यह दूसरों के लिए अनुसरण करने का एक उदाहरण होगा। शिक्षा कैसे सबकुछ बदलने की ताकत रखती है और इंसान को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जाती है, मैं इसका जीवंत उदाहरण हूँ।

उनका मानना है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कहां से आए हैं और आप कौन हैं – एक आईएएस के रूप में आप एक भारतीय हैं और आपको देश के लिए काम करना चाहिए। जब हम अपनी विविधता को एक ताकत बनाते हैं, तो हम सबसे अच्छे और तेज़ी से प्रगति करेंगे, जब हम सभी को साथ लेते हैं और जब हम एक राष्ट्र के रूप में सोचते हैं।

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सुकून की तलाश में दो बहनों ने नौकरी छोड़ किया गाँव का रुख, जैविक खेती से बदल रही किसानों की जिंदगी..


आज के युवा जहाँ एक ओर शहरी चमक धमक से प्रभावित हो रहे हैं और शहरों में बसने की चाह में अपनी जन्मभूमि अपने गाँवों से विमुख हो रहे हैं। आए दिन हम पढ़ते हैं कि उत्तराखंड के गाँवों से निरंतर पलायन हो रहा है, गाँवों में केवल बुजुर्ग शेष रह गए हैं। ऎसे में यदि हम आपको बताये कि आज भी कुछ युवा हैं जो महानगरों की चमक-धमक, अच्छी ख़ासी नौकरी और समस्त सुख सुविधाओं को अलविदा कहकर अपने गाँवों का रुख कर रहे हैं, अपने गाँवों को तरक्की के पथ पर अग्रसर करने के लिए कार्यरत हैं तो आपको विश्वास नहीं होगा।

यह सच है कि उत्तराखंड की दो बेटियाँ कुशिका शर्माऔर कनिका शर्मा ने अपनी अच्छी ख़ासी मोटी तनख़्वाह की नौकरी को तवज्जो ना देकर रुख किया अपने गाँव का। दिल्ली जैसे महानगर की सुख सुविधाएं सिर्फ इसलिए छोड़ दी ताकि पहाड़ों को फिर से जीवन दे सकें।

जी हाँ, कुशिका और कनिका शहर में रहकर अपनी जिंदगी बड़े आराम से गुजार रही थीं लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि रोज की भागदौड़ में वो सुकून नहीं था जो पहाड़ की वादियों में था। दोनों बहनों ने तय किया कि वो सब कुछ छोड़कर उत्तराखंड में बसे अपने गाँव मुक्तेश्वर में जाकर गाँव की प्रगति में अपना योगदान देंगी। परिवार का समर्थन मिला और उन्होंने गाँव जाकर रास्ता चुना ऑर्गेनिक खेती के प्रति जागरूकता लाने का। मुक्तेश्वर जाकर दोनों बहनों ने ‘दयो – द ओर्गानिक विलेज रिसॉर्ट‘ का शुभारंभ किया और स्थानीय लोगों को जैविक खेती के प्रति जागरूक करने लगी। साथ ही अब दोनों बहनों की कोशिश अपना कार्यक्षेत्र विस्तारित करने की है ताकि उत्तराखंड के अन्य गाँवों को भी जागरूक किया जा सके। साथ वे अब कृषि उत्पादों को बेचने के लिये सप्लाई चेन बनाने की भी योजना पर कार्य कर रही हैं।

कुशिका और कनिका ने अपनी स्कूली शिक्षा उत्तराखंड के नैनीताल और रानीखेत से पूरी की। स्कूली शिक्षा पूर्ण होने के बाद कुशिका ने एम.बी.ए करने का निर्णय लिया। एम.बी.ए करने के बाद कुशिका ने करीब चार साल तक गुड़गांव की एक मल्टी नेशनल कंपनी में बतौर सीनियर रिसर्च एनालिस्ट के रूप में कार्य किया। तो वहीं दूसरी ओर उनकी बहन कनिका ने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से अच्छे अंको के साथ मास्टर्स की डिग्री हासिल की जिसके बाद कनिका को हैदराबाद में आंत्रप्रेन्योरशिप में स्कॉलरशिप मिल गई। अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में दोनों बहनों को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ काम करने का अवसर मिला। लेकिन पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में दोनों बहनों को नैनीताल में रहने वाले अपने परिवार से दूर रहना पड़ता था लेकिन जब भी उन्हें मौका मिलता तो वे दोनों अपने परिवार से मिलने के लिये नैनीताल पहुंच जाती। इस दौरान उन्होंने अनुभव किया कि अपने बच्चों को अपने पास पाकर उनके पिता को कितना सुकून मिलता है और जैसे ही दोनों बहनों के पुनः अपने काम पर लौटने का दिन करीब आने लगता तो पिता की उदासी बढ़ने लगती, दोनों बहनों को भी पिता से दूर जाना अच्छा तो नही लगता पर क्या करे काम भी तो जरूरी था।

इस तरह दोनों बहनों ने अपने गाँव के शांतिपूर्ण स्वच्छ वातावरण में रहते हुए जैविक खेती करने का दृढ़ निश्चय किया और अपनी नौकरी को अलविदा बोल कर अपने परिवार के साथ अपने गांव मुक्तेश्वर आ गयी। शुरुआत में उन्हें कई तरह की मुश्किलों का भी सामना करना क्योंकि वहाँ के लोगों के लिए उनका विचार बिलकुल नया था, जिस पर उन्हें विश्वास करने में कुछ समय लगना स्वभाविक था। मुक्तेश्वर में रहकर दोनों बहनों ने कुछ दिनों तक वहाँ की खेती योग्य स्थितियों और किसानों की स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान इन दोनों ने अनुभव किया कि गाँव की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है लेकिन स्थानीय लोगों में कृषि उत्पादन बढ़ाने को लेकर जागरूकता का अभाव है और ना वहाँ के किसानों को जैविक खेती के बारे में कुछ ज्ञान है और साथ ही उनका मार्गदर्शन करने वाला भी कोई नहीं है।

जबकि दूसरी ओर शहरों में जैविक उत्पादों की मांग है जो निरंतर बढ़ती जा रही है। अपने गाँव में जैविक खेती के विकास के संकल्प को लेकर कुशिका व कनिका ने किसानों से बात करने से पहले स्वयं जैविक खेती और जीरो बजट खेती कैसे की जाती है इसका प्रशिक्षण लेना प्रारम्भ किया। इस तरह की खेती के प्रशिक्षण के दौरान दोनों ने दक्षिण भारत व गुजरात के कई राज्यों का दौरा किया। पूर्ण प्रशिक्षण लेने के बाद साल 2014 में दोनों बहनों ने मिलकर मुक्तेश्वर में 25 एकड़ जमीन पर खेती का कार्य शुरू किया। साथ ही अन्य लोगों का रुख गाँवों की ओर करने हेतु ‘दयो – द ओर्गानिक विलेज रिसोर्ट’ की स्थापना की।

 द ऑर्गेनिक रिसोर्ट के बारे में बताते हुए कनिका कहती हैं कि ” शहरों में रहने के दौरान हमने महसूस किया कि वहाँ रहने वाले लोग कुछ समय प्रकृति के करीब भी रहना चाहते हैं। तब हमने सोचा कि अगर हम लोगों से यह कहेंगे कि आप भी यहां आकर खेती करो तो कोई भी तैयार नहीं होगा। लेकिन जब हम उनसे यह कहेंगे कि आप यहां आकर कुछ दिन छुट्टियाँ मनाइये तो हर कोई इसके लिये तैयार हो जाएगा और गाँवों में आना भी पसंद करेगा।“

साथ ही दोनों ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जब भी कोई शहरों से यहां पर छुट्टियाँ मनाने के लिये आये तो उसे यहां स्वर्ग का आंनद अनुभव हो और गाँव में रहकर कुछ ऐसा करने को मिले जो उनके लिए नया और स्वास्थ्यवर्धक हो। इसलिए उन्होंने अपने ऑर्गेनिक विलेज रिसोर्ट के नाम के आगे दयो शब्द का प्रयोग किया जो कि संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है “स्वर्ग“। रिसॉर्ट प्रारम्भ होने के साथ ही दोनों बहनों को सैलानियों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। 5 कमरों वाले मुक्तेश्वर के इस रिसोर्ट में कमरों का नामकरण भी किया गया है जो संस्कृत भाषा से लिए गए प्रकृति के पांच तत्वों पर आधारित है। रिसोर्ट के कमरो के नाम है उर्वी, इरा, विहा, अर्क और व्योमन। यह अपने आप में अनोखा है।

यहां आने वाले सैलानियों को यह सुविधा दी जाती है कि वो फॉर्म में जाकर अपने हाथों से अपनी पसंद की सब्जियों को तोड़ सकते हैं और रिसॉर्ट के शेफ को देकर मनपसंद खाना बनवा सकते हैं। उनके रिसॉर्ट में इस समय करीब 20 लोग काम कर रहे हैं। रिसोर्ट की बाकी जमीन पर ये बहनें अपनी खेती का काम कर रही हैं। इसके साथ ही दोनो बहने गाँव के बच्चों को शिक्षा के प्रति भी जागरूक कर रही है।

पर्यटन विकास और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने को ध्यान में  रखते हुए ही कुशिका और कनिका ने सबसे पहले स्थानीय लोगों को हॉस्पिटैलिटी का प्रशिक्षण दिया। जिसका परिणाम यह है कि आज खेती से लेकर किचन तक का सारा काम स्थानीय लोग स्वयं संभाल रहे हैं और उन्हें आर्थिक सहायता भी प्राप्त हो रही है। दोनों बहनें यहां रिसॉर्ट में पैदा होने वाले जैविक कृषि उत्पादों को बेचने के लिए सप्लाई चेन बनाने का विचार कर रही है। इसी विचार को प्रयोग में लाते हुए उन्होंने इस सीजन में अपने रिसॉर्ट की सब्जियों और फलों को मंडियों में भी बेचना प्रारम्भ किया है।

आज कुशिका और कनिका ना केवल अपने इस काम से बहुत खुश और उत्साहित हैं बल्कि आसपास रहने वाले ग्रामीण लोगों को रोजगार उपलब्ध करवा रही जिससे पलायन की समस्या को हल किया जाए। जैविक खेती के प्रति भी जागरूक कर रही है जो गाँव के लोगों को एक दिशा प्रदान करने का कार्य है।

वाक़ई में यदि पलायन रोकना है तो हमें भी किसी नए विचार के साथ फिर से अपने गाँवों का रुख करना होगा और एक नयी शुरुआत को जन्म देना होगा। आज समय आ गया है कि युवाओं को शहरों की भीड़ से आगे आकर अपने गाँव को संभालना होगा क्योंकि कुछ अलग करना है तो भीड़ से हटकर चलने की आवश्यकता है। भीड़ साहस तो देती है मगर पहचान छीन लेती है।

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aps

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